रांची: झारखंड की आदिवासी संस्कृति और लोकजीवन से गहराई से जुड़े पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर को आखिरकार भौगोलिक संकेतक (जीआई ) टैग मिल गया है। चेन्नई स्थित भौगोलिक इंडिकेशंस रजिस्ट्री ने इसे “मंदार ऑफ़ झारखंड ” के नाम से पंजीकृत किया है। इस मान्यता के बाद मांदर को झारखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान के साथ आधिकारिक पहचान मिली है। मांदर को जीआई पहचान दिलाने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में शुरू की गई थी। इसके लिए मांदर की पारंपरिक निर्माण पद्धति, स्थानीय कच्चे माल, इसकी विशिष्ट ध्वनि विशेषताओं और झारखंड की लोक-संस्कृति से इसके ऐतिहासिक जुड़ाव से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। मांदर को जीआई मान्यता दिलाने की प्रक्रिया में गुमला के जरजट्टा गांव और रायडीह क्षेत्र के पारंपरिक कारीगरों का विशेष संदर्भ रहा है। वर्ष 2023 में तत्कालीन गुमला प्रशासन ने भी जरजट्टा के मांदर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में प्रक्रिया शुरू की थी। इस पूरी प्रक्रिया में डॉ. सत्यदीप सिंह, एनयूएसआरएल रांची के विजिटिंग फैकल्टी और जी आई विशेषज्ञ, की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। उन्होंने जीआई रजिस्ट्री के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत करने से लेकर अंतिम सुनवाई तक की प्रक्रिया में भाग लिया। जीआई आवेदन में मांदर के झारखंड से ऐतिहासिक जुड़ाव को प्रमाणित करने के लिए पुराने शोध और सरकारी दस्तावेजों का भी सहारा लिया गया। इनमें शरत चंद्र राय (1915), तारक चंद्र दास (1931) और डब्ल्यूजी आर्चर (1940) के कार्यों सहित अन्य ऐतिहासिक अभिलेख शामिल रहे। मांदर झारखंड के कई समुदायों के लोकनृत्य, पर्व-त्योहार और सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। जीआई टैग मिलने से इस पारंपरिक वाद्ययंत्र को अब झारखंड की विशिष्ट भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहचान के साथ आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है।
