राजनगर : राजनगर के महेशकुदर स्थित शहीद निर्मल महतो विद्या मंदिर परिसर में बहुभाषी पत्रिका “प्रभाती” का भव्य विमोचन, साहित्य और समाज सेवा का हुआ सम्मान
राजनगर : (सरायकेला-खरसावाँ), 25 मार्च 2026। राजनगर प्रखंड के महेशकुदर स्थित शहीद निर्मल महतो विद्या मंदिर परिसर में बहुभाषी पत्रिका “प्रभाती” (वर्ष-1, अंक-2) का भव्य एवं गरिमामय शुभ विमोचन कार्यक्रम सह सम्मान समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का वातावरण साहित्यिक उत्साह, सांस्कृतिक गरिमा और सामाजिक प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत रहा।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जिला परिषद सदस्य एवं कर्मठ समाजसेवी अमोदिनी महतो
थीं, जिनके करकमलों से पत्रिका का विधिवत विमोचन संपन्न हुआ। इस अवसर पर राढ़ी
साहित्य अकादमी, झारखंड की ओर से अमोदिनी महतो को “उत्कृष्ट समाजसेवी सम्मान”
तथा प्रख्यात राढ़ी नाट्य लेखक माणिक लाल महतो को “राढ़ी नाट्य सम्राट” की मानद
उपाधि मोमेंटो, शॉल एवं पत्रिका भेंट कर सम्मानित किया गया।
अपने संबोधन में मुख्य अतिथि अमोदिनी महतो ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र में इस
प्रकार की बहुभाषी पत्रिका का प्रकाशन अत्यंत गर्व का विषय है। उन्होंने
“प्रभाती” को शिक्षा का दर्पण बताते हुए इसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की तथा
अधिकाधिक लोगों से इस सार्थक साहित्यिक पहल से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने
कहा कि ग्रामीण अंचल से निकलने वाली ऐसी पहल समाज को नई दिशा देने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पत्रिका के संरक्षक माणिक लाल महतो ने अपने उद्बोधन में कहा कि “प्रभाती एक नई
सुबह की पहली किरण के समान है, जो आंचलिक रचनाकारों की संवेदनाओं, विचारों और
स्थानीय सरोकारों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है।” उन्होंने कहा कि यह
पत्रिका शब्दों के माध्यम से समाज को जोड़ने और हर हृदय में जागृति की प्रभात
जगाने का प्रयास है।
“प्रभाती” के इस अंक में 45 प्रतिष्ठित आंचलिक लेखक-लेखिकाओं की रचनाएँ संकलित
की गई हैं। पत्रिका में हिंदी, बांग्ला, ओड़िया, अंग्रेज़ी, संथाली, खोरठा एवं
नागपुरी भाषाओं में रचित 19 कहानियाँ, 45 कविताएँ, 2 लोक-संगीत रचनाएँ तथा 10
विचारात्मक एवं उपयोगी लेख शामिल हैं, जो इसकी बहुभाषी और बहुआयामी साहित्यिक
पहचान को दर्शाते हैं।
कार्यक्रम में डॉ. अरूपनन्द मंडल, अस्विनी प्रधान, अधिवक्ता गौतम मंडल,
श्रीकांत महतो सहित अनेक गणमान्य लेखक-लेखिकाओं एवं साहित्य प्रेमियों की
गरिमामयी उपस्थिति रही।
समारोह ने न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति को मंच प्रदान किया, बल्कि क्षेत्रीय
भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक मजबूत संदेश भी दिया।

